सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' का जीवन परिचय
जीवन परिचय
अज्ञेय जी का जन्म मार्च सन् 1911 में पंजाब के कर्त्तारपुर नामक नगर में हुआ था। बचपन में वे अपने पिता के साथ देश के विभिन्न भागों जैसे- कश्मीर, चेन्नई, बिहार में रहे थे। इस तरह अलग-अलग स्थानों पर रहने के कारण अज्ञेय जी पुरातत्व के अवशेषों के संपर्क में रहे थे। इस कारण उनका स्वभाव कुछ विशिष्ट प्रकार का बन गया था। अज्ञेय जी ने संस्कृत और फारसी की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने अपने स्नातक स्तर पर बी.एस.सी. की पढ़ाई की थी। आगे चलकर उन्होंने अंग्रेजी विषय से एम.ए. करने के लिए दाखिला लिया। एम.ए. के अध्ययन के दौरान वे क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बन गए। आंदोलन करने के कारण उन्हें चार वर्ष के लिए जेल में रहना पड़ा और दो वर्ष के लिए नजरबंद रहना पड़ा। अज्ञेय जी ने बहुत से अलग-अलग स्थानों पर कार्य किया था। वे आकाशवाणी में रहे थे। इसके अलावा उन्होंने कुछ दिनों तक सेना में भी कार्य किया था। कुछ दिनों तक अज्ञेय जी अमेरिका में भारतीय साहित्य और संस्कृति के अध्यापक भी रहे थे। उन्होंने यूरोप, जापान और पूर्व एशिया की विदेश यात्राएँ भी की थीं। अज्ञेय जी ने भारत में जोधपुर विश्वविद्यालय में तुलनात्मक साहित्य और भाषा अनुशीलता विभाग के निर्देशक के रूप में भी कार्य किया था। उन्होंने 'नया प्रतीक' का संपादन किया था। अज्ञेय जी की सबसे बड़ी उपलब्धि सन् 1943 में संपादित 'तार सप्तक' है। इसका संपादन अज्ञेय जी ने ही किया था। तार सप्तक के माध्यम से उन्होंने कवियों और कविताओं की विशिष्ट भावधारा को प्रस्तुत किया। उन्होंने काव्य रचना के अलावा चित्रकला, मूर्तिकला, पुरातत्व और विज्ञान के नवसृजन में योगदान दिया। उन्होंने नवीन मूल्यों की खोज की तथा उनके काव्य में प्रस्तुतीकरण के लिए प्रयास किया। अज्ञेय जी को प्रयोगवाद का प्रवर्तक माना जाता है। 4 अप्रैल सन् 1987 अज्ञेय जी इस संसार को सदैव के लिए छोड़ कर चले गए।
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रचनाएँ
विद्यार्थी जीवन से ही अज्ञेय जी को काव्य लेखन में विशेष रूचि थी। उन्होंने जीवन पर्यंत नवीन मूल्यों की खोज की और उनका अपने काव्य में प्रस्तुतीकरण किया। अज्ञेय जी की पहली कविता सन् 1927 में कॉलेज पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद अज्ञेय जी लगातार काव्य रचनाएँ करने लगे। उनकी प्रारंभिक रचनाओं में छायावादी वैयक्तिकता, निराशा एवं वेदना के भाव दिखाई देते हैं। प्रयोगवादी रचनाओं में चिन्ताभावों और सौंदर्य बोध के दर्शन होते हैं। ये रचनाएँ अभिव्यक्ति के नये आयामों और रूपों को स्वर देती हैं। काव्य के अलावा अज्ञेय जी ने नाटक, निबंध, कहानी, समीक्षा, उपन्यास, यात्रा-वृत्त आदि की भी रचनाएँ की। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं–
1. भग्नदूत (कविता)
2. चिन्ता (कविता)
3. हरी घास-पर क्षण भर (कविता)
4. बावरा अहेरी (कविता)
5. कितनी नावों में कितनी बार (कविता)
6. आंगन के पार द्वार
7. अरी ओ करुणा प्रभामय
8. इन्द्रधनु रौंदे हुए ये
9. पूर्वा
10. सुनहले शैवाल
11. इत्यलम्
12. मैं सन्नाटा बुनता हूँ।
13. शेखर एक जीवनी (उपन्यास)
14. नदी के द्वीप (उपन्यास)
15. अपने-अपने अजनबी (उपन्यास)
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भावपक्ष
अज्ञेय जी के काव्य का मूल उद्देश्य प्रेम और सौंदर्य था। उन्होंने प्रेम और सौंदर्य का सहज और स्वाभाविक चित्रण किया है। संकीर्णता से दूर अज्ञेय जी यथार्थता को अधिक महत्व देते थे। उनके काव्य में वैयक्तिकता और बौद्धिकता के दर्शन होते हैं। उन्होंने आधुनिक युग के वैज्ञानिक अनुसंधानों से उत्पन्न संकटों पर चिंता अभिव्यक्त की है। अज्ञेय जी ने प्राचीन परंपराओं की अवहेलना की है। उन्होंने नवीन मान्यताओं का रचनात्मक ढंग से काव्य में प्रस्तुतीकरण किया है। हिंदी काव्य को आधुनिक बनाने का महत्वपूर्ण कार्य अज्ञेय जी ने ही किया था। उन्होंने नवीन विषयों पर काव्य रचनाएँ की थी। रहस्यात्मकता भी अज्ञेय जी के काव्यों का प्रमुख विषय रहा है।
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कलापक्ष
अज्ञेय जी ने विविध प्रकार के प्रयोगों के माध्यम से काव्य रचना की है। उन्होंने शिल्प में नए-नए प्रयोग किए हैं। अज्ञेय जी की भाषा खड़ी बोली है। उन्होंने वैचारिकता के अनुसार भाषा का प्रयोग किया है। उन्होंने अन्य भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग किया है। अज्ञेय जी ने नवीन प्रतिकों और उपमानों का प्रयोग किया है। उनकी शैली मुक्त शैली है। उन्होंने छंदों का बहुत कम प्रयोग किया है।
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साहित्य में स्थान
अज्ञेय जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उनका पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय' है। उनकी रचनाशीलता तथा क्रियाशीलता से सजे व्यक्तित्व व कृतित्व की हिंदी जगत में विशिष्ट छाप है। हिंदी साहित्य में अज्ञेय जी ने अनेक मौलिक परिवर्तनों का समावेश किया है। उन्हें प्रयोगवाद के जन्मदाता और नई कविता के कर्णधार के रूप में जाना जाता है। हिंदी साहित्य के कवियों में अज्ञेय जी का महत्वपूर्ण स्थान है।
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