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ग्लोब और मानचित्र | globe and map

ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जिस पर जीवन है क्योंकि पृथ्वी पर जल और वायु दोनो विद्यमान है। पृथ्वी को यदि हम सामान्य रूप से देखें तो इसे दूर-दूर तक सपाट रूप में हो देख पाते है। पृथ्वी बहुत विशाल है। इसलिए इतनी बड़ी पृथ्वी को हम पृथ्वी से ही एक साथ नहीं देख पाते हैं। लेकिन यदि अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखें, तो पृथ्वों की आकृति या आकार गोलाकार है। 'ग्लोब' पृथ्वी का एक नमूना अर्थात पृथ्वी जैसी आकृति का एक मॉडल है। जो पृथ्वी की आकृति का सही-सही प्रतिनिधित्व करता है। ग्लोब की सहायता से हम ठीक तरह से जान पाते हैं कि पृथ्वी की आकृति खेलायर है। भूगोल में ग्लोब का बहुत महत्व है। क्योंकि इसकी मदद से ही हम पृथ्वी के आकार, उसके झुकाव, उसकी गति को समझ पाते हैं और उससे जुड़ी घटनाओं को समझने का प्रयास करते हैं। इसके साथ ही हम पृथ्वी पर जल और थल के वितरण यानि महासागरों और महाद्वीपों के विस्तार व पृथ्वी पर उनकी स्थिति को देख व समझ पाने है।

पृथ्वी का आकार गोलाकार है। पृथ्वी अपने अक्ष पर सीधी नहीं है बल्कि कुछ झुकी (232) हुई है। पृथ्वी धुवों पर थोड़ी चपटी है। पृथ्वी का अपनी धुरी (कील) पर घूमना। ग्लोब पर खीची आड़ी व खड़ी रेखाओं की विशेषताएं। ग्लोब पर कई रंग दिखाई पड़ते है जिसमें नीला रंग सबसे ज्यादा दिखाई देता है। जो जल भाग को दर्शाता है। पृथ्वी पर महाद्वीप, महासागर, द्वीप, प्रमुख पर्वत, देशों इत्यादि की स्थिति को जान पाते है। पृथ्वी पर दिन-रात का होना।

महाद्वीप और महासागरों के नाम

महाद्वीप
1. एशिया
2. अफ्रीका
3. उत्तर अमेरिका
4. दक्षिण अमेरिका
5. यूरोप
6. ऑस्ट्रेलिया
7. अंटार्कटिका

महासागर
1. प्रशांत महासागर
2. हिंद महासागर
3. अंटार्कटिक महासागर
4. आर्कटिक महासागर

ग्लोब-
ग्लोब पृथ्वी का एक नमूना है, जो पृथ्वी की आकृति का सही-सही प्रतिनिधित्व करता है।
महाद्वीप-
पृथ्वी के बड़े भू-भाग जिसमें कई देश होते है, उसे महाद्वीप कहते हैं। पृथ्वी पर 7 महाद्वीप है।
महासागर-
पृथ्वी पर फैले विशाल जल भाग को महासागर कहते है। पृथ्वी पर प्रमुख 4 महासागर है।

मानचित्र की आवश्यकता

जब तक हम पूरी पृथ्वी की बात करते हैं तब तक ग्लोब हमारे लिए बहुत उपयोगी होता है। लेकिन ग्लोब के उपयोग की कुछ सीमाएं भी है। जब हम पृथ्वी के किसी स्थान विशेष या छोटे भाग का अध्ययन करना चाहे जैसे देश, जिले, शहर या गांव की जानकारी प्राप्त करना चाहे तब हमें मानचित्र की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि मानचित्र की सहायता से हम किसी भी भू-भाग का भलीभांति पठन-पाठन कर सकते हैं।
इस प्रकार- गोलाकार पृथ्वी अथवा उसके किसी भू-भाग का मापन के अनुसार समतल सतह पर चित्रण मानचित्र कहलाता है।

मानचित्र शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द 'मेप्पा' (Mappa) से हुई है। जिसका शाब्दिक अर्थ है मेजपोश या रूमाल । मध्यकाल में संसार का चित्र कपड़े पर बनाये जाते थे। अंग्रेजी भाषा का 'मेप' शब्द लेटिन भाषा mappa का ही अपभ्रंश है। अंग्रेजी शब्द map को हिन्दी में मानचित्र कहते हैं। इसी तरह संसार के विभिन्न छोटे-छोटे भागों के मानचित्र भी होते है। किसी गांव या शहर के एक छोटे हिस्से का भी मानचित्र होता है जैसे आप अपने गांव के मानचित्र को पटवारी के पास देख सकते है।

"मानचित्र को कैसे पढ़े ?

जिस तरह हम पुस्तक पढ़ते है। पुस्तकों को पढ़कर अनेक जानकारी प्राप्त करते हैं। ठीक उसी तरह मानचित्र को पढ़ा व समझा जाता है। मानचित्र मुख्यतः चार बिंदुओं के आधार पर पढ़ा व बनाया जा सकता है- शीर्षक, दिशा, रुढचिन्ह और मापक मानचित्र इस प्रकार बनाया जाता है जैसे हम पृथ्वी या उसके उस हिस्से को, जिसका मानचित्र बना रहे है, ऊपर से देख रहे है।

शीर्षक-
प्रत्येक मानचित्र का एक शीर्षक होता है, जो यह बताता है कि मानचित्र विश्व या विश्व के किस भू-भाग का है। उपर्युक्त मानचित्र का शीर्षक 'भारत है अर्थात यह भारत देश का मानचित्र है। सामान्यत शीर्षक मानचित्र के दायों और लिखा होता है।
दिशा-
यह मानचित्र की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है। प्रत्येक मानचित्र में उत्तर दिशा को तौर के चिन्ह द्वारा दिखाया जाता है। दिशा के बिना मानचित्र पढ़ना मुश्किल होता है। परम्परा के अनुसार उत्तर दिशा मानचित्र के ऊपरी हाशिए की ओर इंगित होता है।
रूढचिन्ह-
मानचित्र में कई विषय वस्तुओं, बिंदुओं इत्यादि को कुछ पारम्परिक चिन्हों के द्वारा वर्षों से उपयोग में लाया जाता रहा है। इन चिन्हों को रूढ़ चिन्ह कहते हैं। कुछ रूढचिन्हों को यहाँ बताया गया है।
मापक-
धरातल की वास्तविक दूरी को कागज पर आनुपातिक रूप में छोटा या बड़ा, मापक की सहायता से ही दर्शाया जाता है। उदाहरण के लिए धरातल की वास्तविक दूरी 1 कि.मी. को कागज में दर्शाना हो तो मान सकते हैं 1 से.मी. = 1 कि.मी. हर मानचित्र में पैमाना (मापक) अलग हो सकता है। प्रत्येक मानचित्र में मापक शीर्षक के नीचे या फिर मानचित्र में नीचे की और लिखा होता है। इस प्रकार पैमाने के अनुसार मानचित्र में किन्हीं दो स्थानों की दूरी को मापक से मापकर उन्हीं दो स्थानों की धरातल पर वास्तविक दूरी को जान सकते हैं।
इसके अलावा मानचित्र में रंगों का उपयोग भी किया जाता है। जल भाग को नीले रंग से दर्शाया जाता है, पहाड़ी भाग को भूरे रंग से दर्शाया जाता है और मैदान को हरे रंग से दर्शाया जाता है, आदि।

I hope the above information will be useful and important.
(आशा है, उपरोक्त जानकारी उपयोगी एवं महत्वपूर्ण होगी।)
Thank you.
R F Temre
pragyaab.com

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